द बिग पिक्चर:इज़रायल-फिलिस्तीन संघर्ष

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चर्चा में क्यों?
भारत, संयुक्त राज्य अमेरिका और कई अन्य देशों ने इज़रायल और फिलिस्तीनी उग्रवादियों के बीच बढ़ते तनाव और हिंसा के मध्य शांति और संयम बरतने का आह्वान किया है।

हिंसा शुरू होने के बाद हुए संघर्ष और हवाई हमलों में दर्जनों लोग मारे गए हैं, जिसमें इज़रायल में एक 30 वर्षीय भारतीय महिला भी शामिल है, जो गाजा से फिलिस्तीनी आतंकवादियों द्वारा रॉकेट हमले में मारी गई।

 

प्रमुख बिंदु:
भारत का रुख: संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की बैठक में भारत ने यरुशलम में झड़पों और हिंसा पर गहरी चिंता व्यक्त की और दोनों पक्षों से स्थिति को बदलने का आह्वान किया।
संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि ने तत्काल शांति वार्ता फिर से शुरू करने और दो राज्यों के समाधान हेतु प्रतिबद्धता पर बल दिया।
अमेरिका का पक्ष: अमेरिकी राष्ट्रपति ने कई लोगों की जान लेने वाली इस घातक हिंसा को समाप्त करने का भी आह्वान किया है।
हालाँकि अमेरिका ने कहा कि अगर इज़रायल पर रॉकेटों से हमला किया जाता है तो उसे अपनी रक्षा करने का अधिकार है।
अरब दुनिया की प्रतिक्रिया: ईरान, कतर और तुर्की पूरी तरह से फिलिस्तीन का समर्थन करते हैं और हमास का समर्थन कर रहे हैं।
इज़रायल-फिलिस्तीन
विवाद: यह यरुशलम के प्रतीक और भूमि को लेकर सदियों पुराने संघर्ष से जुड़ा है।
वर्ष 1948 के पहले अरब-इज़रायल युद्ध में इज़रायल ने शहर के पश्चिमी आधे हिस्से पर कब्ज़ा कर लिया, और जॉर्डन ने पूर्वी हिस्से पर कब्ज़ा कर लिया, जिस पर बाद में इज़रायल ने कब्जा कर लिया।
तब से इज़रायल ने पूर्वी यरुशलम में बस्तियों का विस्तार किया है।
फिलिस्तीनी पूर्वी यरुशलम को राजधानी बनाना चाहते हैं।
इज़रायल पूरे शहर को अपनी “एकीकृत, शाश्वत राजधानी” के रूप में देखता है, जबकि फिलिस्तीनी नेतृत्व इस संबंध में किसी भी समझौते से इनकार करता है जब तक कि पूर्वी यरुशलम को भविष्य के फिलिस्तीनी राज्य की राजधानी के रूप में मान्यता नहीं दी जाती है।
फिलिस्तीनियों को पूर्वी यरुशलम के पास स्थित शेख जर्राह से बेदखल होने के खतरे का सामना करना पड़ रहा है।
हाल ही में इज़रायली सशस्त्र बलों ने यरुशलम में ज़ायोनी राष्ट्रवादियों द्वारा वर्ष 1967 में शहर के पूर्वी हिस्से पर इज़रायल के कब्ज़ेको स्मरण करते हुए निकाले जाने वाले मार्च से पहले यरुशलम के हरम अस-शरीफ में अल-अक्सा मस्जिद पर हमला कर दियागया।
अल अक्सा मस्जिद मक्का और मदीना के बाद इस्लाम का तीसरा सबसे पवित्र धर्मस्थल है।
इसने पूरे क्षेत्र में इस्लाम के अनुयायियों में भय पैदा कर दिया और कट्टरपंथियों ने अल अक्सा मस्जिद की रक्षा हेतु आह्वान करना शुरू कर दिया।
वर्ष 2021 की शुरुआत में पूर्वी यरुशलम के केंद्रीय न्यायालय ने यहूदी एजेंसियों के पक्ष में अपने निर्णय को बरकरार रखा, जिसमें न्यायालय ने चार फिलिस्तीनी परिवारों को शेख जर्राह से बेदखल होने के पक्ष में निर्णय दिया था।
यह समस्या अभी भी अनसुलझी है जो गंभीर बनी हुई है।
हिंसा का वर्तमान स्वरुप वर्ष 2014 के बाद से सबसे गंभीर है जिसमें फिलिस्तीनियों द्वारा रॉकेट-फायरिंग और जवाबी कार्रवाई में इज़रायलियों द्वारा किये गए हवाई हमले शामिल हैं।

संघर्ष को भड़काने वाले कारक:
फिलिस्तीन में हमास शासन: हमास वर्ष 1987 में खोजी गई मिस्र के मुस्लिम ब्रदरहुड की हिंसक शाखा है, जो हिंसक जिहाद के माध्यम से “फिलिस्तीन के हर इंच पर अल्लाह के झंडे को ऊपर उठाने” की मांग कर रहा है।
हमास फिलिस्तीनियों का अधिक कट्टरपंथी गुट है जिसने अब जवाबी कार्रवाई शुरू कर दी है।
फिलिस्तीन की तथाकथित राष्ट्रपति सत्ता न तो चुनाव करा रही है, न ही ठीक से काम कर रही है, हमास की तानाशाही और सीमाओं पर इज़रायल की घेराबंदी फिलीस्तीनियों को परेशान कर रही है।
दोनों राज्यों में राजनीतिक अस्थिरता: दोनों पक्षों में नेतृत्व संरचनाओं में अक्षमता और ठहराव है, जिससे बहुत से समूह नियंत्रण से बाहर हो रहे हैं, जो हिंसा का सहारा ले रहे हैं।
इसके अलावा पिछले दो वर्षों में इज़रायल में 4 चुनाव हुए हैं और वे सभी अनिर्णायक थे। इज़रायल के प्रधानमंत्री ने अपना पद बरकरार रखा है लेकिन केवल कार्यवाहक रूप में।

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