गोविन्द गुरु का जीवन परिचय | BIOGRAPHY OF GOVIND GURU IN HINDI

गोविन्द गुरु का जीवन परिचय Biography of Govind Guru In Hindi: वागड़ क्षेत्र डूंगरपुर बाँसवाड़ा में गोविन्द गुरु ने भीलों के सामाजिक एवं नैतिक उत्थान के लिए अथक प्रयास किये. वे महान समाज सुधारक थे.

गोविन्द गुरु का जीवन परिचय | BIOGRAPHY OF GOVIND GURU IN HINDI
गोविन्द गुरु का जीवन परिचय | BIOGRAPHY OF GOVIND GURU IN HINDI

इनका जन्म 20 दिसम्बर 1858 डूंगरपुर राज्य के बसियाँ गाँव में हुआ था. 1880 में स्वामी दयानन्द सरस्वती जब उदयपुर आए,

गोविन्द गुरु उनके विचारों से प्रभावित हुए और उन्होंने भील समाज में सुधार एवं जन जागृति के लिए महत्वपूर्ण कार्य शुरू किया.

मद्यपान एवं माँस सेवन त्याग किया. उन्होंने बनवासी बन्धुओं के मध्य एक बड़ा स्वाधीनता आंदोलन शुरू किया. यह आंदोलन इतना प्रभावशाली था.

कि इससे अंग्रेज, राजे महाराजे, जंगलों में फैले हुए विदेशी पादरी घबरा गये. भीलों को सामाजिक दृष्टि से संगठित करने एवं मुख्य धारा में लाने के लिए गोविन्द गुरु ने सम्प सभा की स्थापना की. इसके साथ ही भीलों का हिन्दू धर्म के दायरे में रखने के लिए भगत पन्थ की स्थापना की. गोविन्द गुरु ने सम्प सभा के माध्यम से इडर, डूंगरपुर, बाँसवाड़ा व गुजरात के भीलों में सामाजिक जागृति का संचार किया. इससे प्रशासन सशंकित हो गया और भीलों को भगत पंथ छोड़ने के लिए दवाब बनाया जाने लगा.

तत्कालीन शासन ने भीलों का कृषि कार्य एवं बेगार करने के लिए विवश किया जाने लगा और जंगल में उनके अधिकारों से वंचित किया गया तो वे आंदोलन करने के लिए विवश हो गये. गोविन्द गुरु ने शिक्षा का प्रसार एवं सामाजिक सुधार का संदेश दिया. अंग्रेजो को यह आंशका थी. कि इन सुधारों व संगठन का मुख्य उद्देश्य भील राज्य की स्थापना करना था. अप्रैल 1913 में डूंगरपुर राज्य द्वारा गोविन्द गुरु को गिरफ्तार किया गया, फिर उन्हें रिहा कर दिया गया.

रिहा होने के बाद गोविन्द गुरु मानगढ़ पहाड़ी पर चले गये जो बाँसवाड़ा राज्य की सीमा पर स्थित है. अक्टूबर 1913 में उसने भीलों को पहाड़ी पर पहुचने का संदेश भिजवाया. भील भारी संख्या में हथियार लेकर उपस्थित हो गये.

बाँसवाड़ा राज्य के सिपाहियों की पिटाई कर दी, पहाड़ी पर हमला कर दिया, मानगढ़ पहाड़ी पर भीलों का पहला सम्मेलन हुआ. आशिवन शुक्ल पूर्णिमा को प्रतिवर्ष सम्प सभा का अधिवेशन होने लगा. इसी क्रम में 17 नवम्बर 1913 को सम्प सभा का सम्मेलन मानगढ़ पहाड़ी पर हुआ, बड़ी संख्या में लोग उपस्थित हुए. बाँसवाड़ा, इडर, डूंगरपुर की सरकार चौकन्नी हो गई.

LGG की स्वीकृति के साथ ही 6 से 10 नवंबर के मध्य मेवाड़ भील कोर को दो कम्पनिया, बेलेजली राइफल की एक कम्पनी तथा जाट रेजिमेंट पहाड़ी पर पहुच गई. जाते ही गोलिया बरसानी शुरू कर दी.

सरकारी आंकड़ो के अनुसार मानगढ़ हत्याकांड में 1500 भील मारे गये. भगत आंदोलन कुचल दिया गया. गोविन्द गुरु को 10 वर्ष का कारावास हुआ.

यदपि इसमे भीलों की बहुत बड़ी राजनैतिक महत्वकांक्षा नही थी. लेकिन अंग्रेजों और शासकों ने इसे एक चुनौती माना, उन्हें बहाना मिल गया और निर्दोष लोगों को गोलियों से भुन दिया गया. मानगढ़ हत्याकांड की यह घटना राजस्थान इतिहास में जलियावाला बाग़ हत्याकांड के नाम से जानी जाती है. गोविन्द गुरु अहिंसात्मक आंदोलन के पक्षधर थे इस आंदोलन के भीलों के साथ साथ समाज के अन्य वर्गो में भी जागृति उत्पन्न हुई,

इसके बाद भीलों ने शासकीय अत्याचार एवं अनावश्यक करों के विरुद्ध आवाज उठाना प्रारम्भ कर दिया. अंग्रेजों व रियासत दोनों को इसका सामना करना पड़ा.

गोविन्द गुरु की जीवनी व इतिहास- Gobind Guru Biography In Hindi

गोविन्द गुरु का जन्म डूंगरपुर के बासियाँ गाँव में एक बंजारा परिवार में 20 दिसम्बर 1858 को हुआ. उसके पुत्रों व पत्नी की मृत्यु ने उसे आध्यात्म की ओर प्रेरित किया और वह सन्यासी बन गया.

वह कोटा बूंदी अखाड़े के साधु राजगिरी का शिष्य बना तथा उसने बेडचा गाँव में धूनी स्थापित कर ध्वज लगाकर आस-पास के क्षेत्र में भीलों को आध्यात्मिक शिक्षा देना प्रारम्भ किया.

गोविन्द गुरु के स्वयं के शब्दों में उसकी मुख्य शिक्षाए इस प्रकार थी, उस समय मैं निर्धन विनम्र एवं जंगली भीलों के मध्य रहता था. जिन्हें स्रष्टिकर्ता का कोई ज्ञान नहीं था. जो मेरी झोपडी पर आते थे, उन्हें मैं सवर्णों की तरह आचरण करने की सलाह देता था.

मैंने उन्हें सत्य व धर्म का रास्ता बताया और उन्हें भगवान् की पूजा करने, चोरी न करने, दूसरों के साथ शत्रुता न रखने, समान पिता की सन्तान मानकर सबका आदर करने तथा अन्यों के साथ शांतिपूर्ण रहने, अपने जीवन का व्यापन करने हेतु कृषि करने, वीर, वन्तरा, भोपा आदि में विश्वास न करने, बल्कि इनमें परित्राण हेतु धुनि व ध्वज स्थापित करने एवं उनकी पूजा करने का उपदेश देता था.

सम्प सभा की स्थापना

गोविंद गुरु ने 1883 ई में सम्प सभा की स्थापना की व इसके माध्यम से भीलों में सामाजिक एवं राजनीतिक जागृति पैदा कर उन्हें संगठित किया. जिससे भीलों ने सामंतों की बैठ बेगार बंद कर दिया. यह देखकर रियासतों के शासक चिंतित हो उठे.

उन्होंने भीलों के संगठन को कुचलने के लिए षड्यंत्र करने शुरू कर दिए. 1998 ई के पश्चात गोविन्द गुरु का प्रभाव गुजरात के भील क्षेत्रों में भी फ़ैल गया. उसने भील जीवन के कष्टों के कारणों को उजागर करते हुए उन्हें शोषक एवं उत्पीड़क व्यवस्था के विरुद्ध लड़ने के लिए प्रेरित किया. अन्तः राजाओं ने अंग्रेजों रेजिडेंट को शिकायत की की भील डूंगरपुर बाँसवाड़ा में अपना राज्य स्थापित करने के प्रयास कर रहे हैं.

तथा इस कारण हजारों भील मानगढ़ में सशस्त्र इकट्ठे हुए हैं. वास्तव में भील मानगढ़ की धुनी पर मार्गशीर्ष पूर्णिमा को नारियल और घी का होम कर रहे थे. तब ही 8 नवम्बर 1913 को एजीजी के आदेश पर सेना वहां पर पहुची और 17 नवम्बर 1913 को पहाड़ी को घेरकर भीलों पर गोलियों की बौछार कर दी. जिससे लगभग 1500 भील मारे गये.

गोविन्द गुरू को गिरफ्तार कर अहमदाबाद जेल में बंद कर दिया गया. प्रथम विश्वयुद्ध के बाद गोविन्द गुरु जेल से छूटे लेकिन उन्हें बाँसवाड़ा व डूंगरपुर राज्यों की सीमाओं में प्रवेश नहीं करने दिया गया.

Bhagat Andolan In Hindi गुरु गोविन्द गिरी का भक्त आंदोलन का इतिहास

राजस्थान के डूंगरपुर व बाँसवाड़ा में भील जनजाति में सामाजिक जाग्रति उत्पन्न करने व भील जनजाति को संगठित करने हेतु गोविन्द गुरु Bhagat Andolan द्वारा भक्त आंदोलन चलाया गया.

Bhagat Andolan के सूत्रधार गोविन्द गुरु का जन्म डूंगरपुर राज्य  के बांसियाँ गाँव में 20 दिस. 1858 को एक बंजारा परिवार में हुआ था. गुरु गोविन्द गिरी ने 1883 ई में सम्प सभा की स्थापना की. उन्होंने मानगढ़ पहाड़ी को अपना कार्यस्थल बनाया, इनके शिष्य भगत कहलाए.

17 नवम्बर 1913 को मार्गशीर्ष पूर्णिमा के दिन मानगढ़ पहाड़ी पर एकत्रित हजारों भील आदिवासी पर कर्नल शटन के आदेश पर रियासत की सैनिक टुकड़ियो ने फायरिंग की जिसमें करीब 1500 भील मारे गये.

गोविन्द गिरी द्वारा भीलों को संगठित कर भक्त आंदोलन की शुरुआत

गोविन्द गिरी व डूंगर के पटेल पुंजा धीर को बंदी बना लिया गया. पूंजा धीर ही पहला व्यक्ति था जिसने आत्मसमर्पण करते हुए अन्यों को भी आत्म समर्पण के लिए प्रेरित किया.

दोनों को संतरामपुर व अहमदाबाद की साबरमती जेल में रखा गया.इस प्रकार भील क्रांति को निर्दयता पूर्वक कुचल दिया गया.

मानगढ़ हत्याकांड राजस्थान में जलियांवाला बाग हत्याकांड के नाम से जाना जाता हैं. बम्बई सरकार ने बेलगाम के अतिरिक्त सेशन जज फेडरिक विलियम एलीसन को तथा एजीजी राजपुताना ने मेजर ह्यूज आगस्टस केप्पेल गफ को ट्रिब्यूनल का सदस्य मनोनीत किया गया.

2 फरवरी 1914 को यह ट्रिब्यूनल गठित किया गया. इस ट्रिब्यूनल ने संतरामपुर में मुकदमे की सुनवाई की, गोविन्द गिरी को मृत्यु दंड व पुंजा धीर को आजीवन कारावास की सजा दी गई. गोविन्द गिरी की सजा को आर पी बारो ने आजीवन कारावास की सजा में बदल दिया. सजा को कम करते हुए उन्हें 12 जुलाई 1923 को संतरामपुर जेल से इस शर्त पर रिहा किया गया कि वे संतरामपुर, डूंगरपुर, बाँसवाड़ा व कुशलगढ़ के राज्यों में प्रवेश नहीं करेगे.

गुरु गोविन्द गिरी जेल से छूटने के बाद अहमदाबाद संभाग में पंचमहल जिले के झालोद तालुका के क्म्बोई गाँव में रहने लगे. वहीँ 30 अक्टूबर 1931 को उनका देहांत हो गया. कम्बाई में अब भी उनकी समाधि स्थल पर एक चबूतरा बना हुआ हैं. मानगढ़ धाम में 2 सितम्बर 2002 को तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत द्वारा शहीद स्मारक का लोकार्पण किया गया. मानगढ़ धाम राजस्थान, गुजरात और मध्यप्रदेश के आदिवासियों में अपार श्रद्धा का केंद्र स्थल हैं. मानगढ़ हिल पर गोविन्द गुरु के नाम पर बोटेनिकल गार्डन का उद्घाटन किया गया.

FAQ

गोविन्द गुरु का जन्म कहा हुआ

गोविन्द गुरु का जन्म 20 दिसम्बर, 1858 को डूंगरपुर जिले के बांसिया (बेडसा) गांव में गौर जाति के एक बंजारा परिवार में हुआ था। बचपन से उनकी रुचि शिक्षा के साथ अध्यात्म में भी थी। महर्षि दयानन्द सरस्वती की प्रेरणा से उन्होंने अपना जीवन देश, धर्म और समाज की सेवा में समर्पित कर दिया।
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